Hind18: Bangladesh Political Tension इन दिनों दक्षिण एशिया की राजनीति में एक अहम विषय बना हुआ है।
हाल के घटनाक्रम में जब तारिक़ रहमान की सक्रियता और स्वागत की खबरें सामने आईं|
भारत की ओर से असहज प्रतिक्रिया देखने को मिली।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और बांग्लादेश की सार्वजनिक जीवन की प्रमुख शख्सियत मोहम्मद यूनुस भी हैं।
भारत और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक रूप से गहरे रहे हैं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक घटनाओं ने रिश्तों में नई संवेदनशीलता पैदा कर दी है।
इस लेख में हम समझेंगे कि यह तनाव क्यों उभरा और इसके पीछे कौन से राजनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं।
मोहम्मद यूनुस: चटगाँव से वैश्विक पहचान तक
मोहम्मद यूनुस का जन्म और पालन-पोषण बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित पोर्ट सिटी चटगाँव में हुआ। वह अपने पिता के नौ बच्चों में तीसरे थे।
बचपन से ही नेतृत्व और सामाजिक भागीदारी में उनकी रुचि थी।
वह बॉय स्काउट्स में सक्रिय रहे और किशोरावस्था में अंतरराष्ट्रीय जैम्बोरी के लिए जापान, अमेरिका और यूरोप की यात्राएँ कीं।
उन्हें अमेरिका की प्रतिष्ठित वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए फुलब्राइट स्कॉलरशिप मिली।
वर्ष 1971 में उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएच.डी. पूरी की और बाद में मिडिल टेनेसी स्टेट यूनिवर्सिटी में अध्यापन किया।
1971 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, जब बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र राष्ट्र बनने की लड़ाई लड़ रहा था|
यूनुस ने अमेरिका में बांग्लादेश को आधिकारिक मान्यता दिलाने के लिए पैरवी की।
उन्होंने प्रवासी बांग्लादेशी समुदाय के लिए एक न्यूज़लेटर भी चलाया, जिससे अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में मदद मिली।
स्वतंत्रता के बाद की भूमिका और राजनीतिक प्रयोग
1972 में यूनुस बांग्लादेश लौटे। उस समय देश के संस्थापक नेता शेख़ मुजीब-उर रहमान के नेतृत्व में नए राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी।
यूनुस ने शुरुआत में सरकार के योजना आयोग में भूमिका निभाई, लेकिन बाद में अपने गृह नगर की यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाने लगे।
2006 में नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बाद उन पर राजनीति में आने का दबाव बढ़ा।
अगस्त 2007 में उन्होंने “नागरिक शक्ति” नाम से एक राजनीतिक दल बनाया।
हालांकि यह प्रयोग अधिक समय तक नहीं चल पाया।
30 नवंबर 2007 को अमेरिकी अख़बार The Wall Street Journal को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि जिस तरह की राजनीतिक पार्टी वह बनाना चाहते थे|
वैसी संरचना तैयार नहीं हो सकी और पार्टी गठन के साथ ही बिखर गई।
शेख़ हसीना और भारत-बांग्लादेश संबंध
बांग्लादेश की राजनीति में शेख़ हसीना का लंबा और प्रभावशाली कार्यकाल रहा है।
उनके नेतृत्व में भारत और बांग्लादेश के संबंधों में मजबूती आई। सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, कनेक्टिविटी और व्यापार जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सहयोग हुआ।
भारत ने बांग्लादेश को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखा है।
आतंकवाद विरोधी सहयोग और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों को रोकने में ढाका की भूमिका को नई दिल्ली ने सकारात्मक रूप से लिया।
तारिक़ रहमान की वापसी और भारत की चिंता
Bangladesh Political Tension का मौजूदा दौर तब तेज़ हुआ जब तारिक़ रहमान की सक्रियता और उनके स्वागत की खबरें सामने आईं।
तारिक़ रहमान को बांग्लादेश की राजनीति में विपक्षी धड़े का प्रमुख चेहरा माना जाता है।
भारत की चिंता का एक बड़ा कारण यह है कि अतीत में कुछ विपक्षी ताकतों के कार्यकाल के दौरान भारत-विरोधी तत्वों को कथित रूप से संरक्षण मिला था।
नई दिल्ली नहीं चाहती कि ढाका की राजनीति में ऐसा कोई समीकरण उभरे जो उसकी सुरक्षा या रणनीतिक हितों को प्रभावित करे।
भारत की तल्ख़ी के 5 बड़े कारण
1. सुरक्षा आयाम
भारत की पूर्वोत्तर सीमा बांग्लादेश से लगती है। किसी भी राजनीतिक अस्थिरता या सत्ता परिवर्तन का असर सीमा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
2. क्षेत्रीय भू-राजनीति
चीन का दक्षिण एशिया में बढ़ता प्रभाव भारत के लिए रणनीतिक चुनौती है।
यदि बांग्लादेश की राजनीति में बदलाव से बीजिंग का प्रभाव बढ़ता है, तो यह नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय होगा।
3. आर्थिक हित
भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ा है।
विस्तृत आंकड़े भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय की वेबसाइट https://commerce.gov.in और बांग्लादेश बैंक की आधिकारिक साइट https://www.bb.org.bd पर देखे जा सकते हैं।
राजनीतिक अस्थिरता से आर्थिक समझौतों पर असर पड़ सकता है।
4. ऐतिहासिक साझेदारी
1971 के युद्ध में भारत की भूमिका बांग्लादेश के निर्माण में निर्णायक रही थी।
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण दोनों देशों के संबंध भावनात्मक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर जुड़े हैं।
5. आंतरिक राजनीति का प्रभाव
बांग्लादेश में किसी भी नए राजनीतिक समीकरण का असर भारत की घरेलू राजनीति पर भी पड़ सकता है, खासकर सीमावर्ती राज्यों में।
यूनुस की भूमिका: नैतिक शक्ति या राजनीतिक समीकरण?
मोहम्मद यूनुस की छवि एक सामाजिक उद्यमी और सुधारवादी अर्थशास्त्री की रही है।
हालांकि उनका राजनीतिक प्रयोग असफल रहा, लेकिन उनकी सार्वजनिक उपस्थिति और वैश्विक प्रतिष्ठा उन्हें बांग्लादेश की राजनीति में एक नैतिक आवाज़ बनाती है।
Bangladesh Political Tension के मौजूदा दौर में यदि यूनुस किसी भी पक्ष के साथ संवाद या समर्थन में दिखाई देते हैं|
उसका प्रतीकात्मक महत्व बड़ा हो सकता है। भारत इस पहलू को भी गंभीरता से देखता है।
आगे क्या?
दक्षिण एशिया की राजनीति में स्थिरता और सहयोग दोनों देशों के हित में है।
भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल सरकारों के बीच नहीं, बल्कि जनता से जनता के रिश्तों पर भी आधारित हैं।
Bangladesh Political Tension का यह दौर बताता है कि क्षेत्रीय राजनीति में हर कदम का असर सीमाओं से परे जाता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ढाका और नई दिल्ली किस तरह संवाद और कूटनीति के माध्यम से इस तल्ख़ी को संतुलित करते हैं।
