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Freebies before elections Supreme Court: जन सुराज की याचिका पर SC की 1 सख्त टिप्पणी, कहा– चुनाव हारे तो कोर्ट आए!

Freebies before elections Supreme Court

Freebies before elections Supreme Court

Hind18: Freebies before elections Supreme Court के लिए एक गंभीर संवैधानिक मुद्दा हैं, लेकिन इसे किसी राजनीतिक पार्टी के कहने पर नहीं उठाया जा सकता — यह स्पष्ट संदेश शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को चुनौती देने वाली जन सुराज पार्टी की याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने न सिर्फ याचिका पर विचार करने से इनकार किया, बल्कि यह भी कहा कि चुनाव में असफल होने के बाद कोर्ट को लोकप्रियता हासिल करने का मंच नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: मुद्दा गंभीर है, लेकिन मंच गलत

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने साफ कहा कि Freebies before elections Supreme Court के लिए निश्चित रूप से एक गंभीर विषय हैं और इस पर पहले से ही कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। लेकिन अगर कोई राजनीतिक पार्टी चुनाव हारने के बाद इस मुद्दे को उठाती है, तो कोर्ट ऐसे मामलों में दखल देने से बचेगा।

सीजेआई ने कहा,

“हम चुनाव से पहले मुफ्त में दिए जाने वाले सामान के सवाल पर बहुत गंभीरता से विचार कर रहे हैं, लेकिन किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी के कहने पर नहीं, जिसने चुनाव में सब कुछ खो दिया हो।”

जन सुराज पार्टी की याचिका क्या थी?

प्रशांत किशोर से जुड़ी जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की वैधता को चुनौती दी थी। पार्टी का आरोप था कि आदर्श आचार संहिता (MCC) लागू होने के बावजूद बिहार सरकार ने ‘जीविका दीदी योजना’ के तहत महिलाओं के खातों में सीधे 10,000 रुपये (DBT) ट्रांसफर किए।

याचिका के अनुसार:

“हाई कोर्ट जाइए” – सुप्रीम कोर्ट की सलाह

जन सुराज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही चुनाव से पहले मुफ्त घोषणाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, इसलिए इस याचिका को भी वहीं सुना जाना चाहिए।

लेकिन पीठ ने साफ कहा कि:

सीजेआई ने तीखे शब्दों में पूछा,

“बिहार चुनाव में आपकी पार्टी को कितने वोट मिले? लोग आपको रिजेक्ट करते हैं और फिर आप लोकप्रियता पाने के लिए न्यायिक मंच का इस्तेमाल करते हैं?”

मुफ्त योजनाएं बनाम चुनावी भ्रष्टाचार

याचिका में दावा किया गया कि बिहार सरकार की यह कार्रवाई:

जन सुराज का तर्क था कि यह “खैरात” है और भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आती है, जिससे पूरे चुनाव परिणाम प्रभावित हुए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सुनने से इनकार करते हुए कहा कि अगर वास्तव में स्कीम को चुनौती देनी थी, तो उसे सीधे तौर पर चुनौती दी जानी चाहिए थी, न कि पूरे चुनाव को रद्द करने की मांग की जाए।

“अगर सत्ता में आए तो वही करेंगे” – कोर्ट की अहम टिप्पणी

सीजेआई सूर्यकांत ने एक बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा:

“हम इन मुद्दों पर तब विचार करेंगे जब कोई समाज के लिए काम करने वाला व्यक्ति इन्हें उठाएगा। राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आकर वही करती हैं, जिसका आरोप वे दूसरों पर लगाती हैं।”

यह टिप्पणी Freebies before elections Supreme Court के पूरे विमर्श को एक व्यापक संदर्भ देती है, जहां अदालत राजनीतिक मंशा और जनहित के बीच फर्क साफ करना चाहती है।

याचिका वापस, हाई कोर्ट जाने की छूट

जब पीठ ने साफ कर दिया कि वह इस याचिका पर विचार नहीं करेगी, तो जन सुराज पार्टी के वकील ने याचिका वापस लेने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी को यह स्वतंत्रता दी कि वह इस मुद्दे को पटना हाई कोर्ट के सामने उठा सकती है।

मार्च में होगी मुफ्त योजनाओं पर बड़ी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

इससे साफ है कि Freebies before elections Supreme Court के एजेंडे से बाहर नहीं हैं, लेकिन अदालत यह तय करना चाहती है कि कौन इस मुद्दे को उठाने के लिए उपयुक्त है।

निष्कर्ष: बड़ा मुद्दा, लेकिन सही मंच जरूरी

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि:

सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है — मुद्दा गंभीर है, लेकिन राजनीतिक असफलता को न्यायिक लड़ाई में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती

आने वाले महीनों में जब सुप्रीम कोर्ट मुफ्त योजनाओं पर व्यापक सुनवाई करेगा, तब यह तय हो सकता है कि भारतीय चुनावी राजनीति में “फ्रीबी कल्चर” की सीमा क्या होनी चाहिए।

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